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  • drsunita82

कर्मनाशा 

विज्ञान संचार के सहारे टूटेंगे कर्मनाशा के मिथक

डाॅ. सुनीता

भारत के नक्से पर मौखिक क़िस्से-कहानियों का पूरा आख्यान अंकित है। जल के कलकल और छलछल की ध्वनियां सिर्फ कानों में मिस्री नहीं घोलती हैं बल्कि मानव जीवन की अहम कड़ी से भी जोड़ती हैं। गौरतलब है कि बगैर हवा-पानी जीवाश्म की कल्पना करना ही नामुमकिन नहीं है।

भारतीय सभ्यता-संस्कृति के हवाओं में किस्से-कहानियों की पुरी दुनिया बसती है। जिसमें देश की छवि आये दिन बदलती नज़र आती है। हिलोरे लेती लहरें, लहराती फसलें, तपते धूप में पेड़ों की डालियों से निकलती आवाजें, जिन्दा होती मूर्दा आत्माएं, तकलीफ़ों को सुखाकर हवा में उड़ा देने की जिद, विडम्बनाओं की अनहोनियों को सिरहाने तकिये के नीचे दबाकर सोना, वक्त के मुट्ठी से सुन्दर व सुहाने सपनों की टोकरी भरने की खूबसूरत बिम्ब बुनने की आदत जैसी तमाम हदीसें जंगल-झाड़ियों, खेत-खलिहानों और हवाओं के पगडंडियों में रचती-बसती हैं।

आधुनिकता का चाहे जितना बड़ा दौर आ जाये मिथकों की कहानियाँ कभी सुप्तावस्था में नहीं जा सकती हैं बल्कि नये दृष्टिकोण से देखने की चाहत युवा मन में उठना लाजिमी है।

हिंदी साहित्य में MYTH, मिथ, मिथाॅस और फैंटेसी को पुनर्स्थापना के साथ ही अवलोकन किया जा सकता है। यह समय-समय पर होता रहता है। मिथक, एक विशेष विधा के तौर पर विविध नाम से दर्ज है। जिसे वाणी का विषय या मौखिक कथा अर्थात कहानी या फिर आख्यान की तरह लिखा जाता रहा है। दूसरे अर्थ में कोरी कल्पनाधर्मी और लोकाअनुभूति के तहत पुनर्चक्रण किया जाता रहा है। जब हम "इनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइंसेज" की दृष्टि से देखते हैं तब अलग शब्दसंधान हाथ लगते हैं जैसे- आशाओं, आकांक्षाओं, स्वप्न, संभावनाओं और धारणाओं के रूप में उल्लेखित हैं।

मिथकों की वैश्विकता प्रमाणित है। होमर, इलियड, मिल्टन, शैले और कीटस अगुआ हैं। भारत में यह वेदों, पुराणों, सदग्रंथों, काव्यों और महाकाव्यों के माध्यम से जनमानस में प्रतिष्ठापित है। अगर हम सोमदेव भट्ट के 'कथासरित्सागर' और रमेश कुंतल मेघ के 'विश्व मिथ सरित्सागर' को ध्यान में रखते हुये नदियों के धारों पर गढ़ी गयी कहानियों की बात करें तो सबसे पहले मुझे अपने चंदौली जिला में बहने वाली नदी कर्मनाशा की याद आती है। कर्मनाशा नदी के संदर्भ में स्थानीय स्तर पर बहुत सारी भ्रांतियाँ हैं।

सदग्रंथों में उल्लेखित है कि एक सौ बानवे किलोमिटर लंबी नदी दो राज्यों की विभाजक रेखा है। यह उत्तर प्रदेश और बिहार को बांटती है। जिसका एक हिस्सा मतलब लगभग एक सौ सोलह किलोमीटर का हिस्सा यूपी में है जबकि छिहत्तर किलोमीटर की नदी बिहार में बहती है। पूर्व मध्य रेलवे ट्रैक पर जब ट्रेन छुक-छुक की गति से आगे बढ़ती है तब पटना से दिल्ली जाने के मार्ग में बक्सर जनपद के पश्चिमी छोर पर उक्त नदी की लहरें अटखेली करती मिलती हैं। जिसका दर्शन सहज व स्वाभाविक है।

कर्मनाशा का उदगम स्थल कैमूर जिला का अघौरा व भगवानपुर में स्थित कैमूर पहाड़ी की देन है। आचार्य कृष्णानंद के कथनानुसार- "जिस नदी के दर्शन व स्नान से नित्य किये गये कर्मों के पुण्य का क्षय, धर्म, वर्ण व संप्रदाय का नाश होता है; वह कर्मनाशा कहलाती है। उन्होंने कहा कि उक्त नदी का उल्लेख श्रीमदभागवत, महापुराण, महाभारत व श्री रामचरितमानस में भी आया है।" अगर हम दंतकथाओं का स्मरण करें तो कहा जाता है कि देवताओं और विश्वामित्र के मध्य लड़ाई होने लगी। बीच में लटके सत्यव्रत के मुंह से तेज गति से लार टपकने लगा जिससे नदी का उदगम हुआ। यह नदी आज धरती पर स्थापित है। उल्टा लटकने और धरती व आकाश के बीच अटकने की वजह से सत्यव्रत को त्रिशंकु के नाम से भी जाना जाता है।

अहम और वहम की लड़ाई के बीच राजा ने नदी को चांडाल बन जाने का श्राप दे दिया चुकी नदी का स्वरूप एक मानस के लार से बन रहा था इसलिये श्राप से शापित हो गयी। जिसकी कहानियाँ आज भी स्थानीय स्तर पर सुनने को मिलती हैं जबकि नदी की पानी ने खेती-किसानी को बहुत लाभ पहुँचाया है जिसकी स्वर्णिम कहानी है। इस पर कम ही बात की जाती है जबकि मिथक को लेकर लोग आये दिन चर्चा करते हैं और मुगालते पालते रहते हैं। संदर्भ स्रोत बताते हैं कि चंदौली को "धान का कटोरा" बनने में इस नदी ने अपने आंचल को विस्तृत कर दिया था तब जाकर यह उपाधि चंदौली जिले के नाम दर्ज हुआ। आज भी लोग लहरों से कभी डरते हैं, तो कभी गदगद हो जाते हैं। पाप-पुष्प का तो पता नहीं है लेकिन यह जरूर कह सकते हैं कि- " "नदियों को तो नाम दिया, बहते धारों का क्या होगा..?" हमें बहने वाले धारों से जो जीवंतता मिलती है उसे सहेजने व स्मृति पटल में अंकित करने की जरूरत है जिससे नयी पीढ़ी को, नयी थाती को, नयी संस्कृति की तरह नहीं बल्कि नये जिन्दगी के तौर पर नदी को सौंप सकें।

उत्तर प्रदेश में इस नदी के करीब बहुतेरे बांध बनाये गये हैं। मूसाखांड बांध, भैंसवाड़ा बांध, लतीफ़साह बांध, अवरवाटांड बांध और नौगढ़ का किला व बांधा प्रमुख हैं।हर बांध की अपनी एक अलग कहानी है। प्रत्येक बंधे ने स्थानीय ग्रामीण जीवन व फसलों के लिये अचूक औषधि का काम किया है। सच तो यह है कि नदी ने गंवईं विकास को तीव्र गति दी है।

नदियाँ उफान, उत्थान-पतन दोनों की गवाह बनती हैं। बाढ़ आ जाये तो विनाश, सूखा पड़ जाये तो अमृतधार बन जाती हैं। ऐसा ही कुछ कर्मनाशा के साथ भी है। चंदौली जिला के चकियां में बनारसीदास की समाधी है। जहाँ प्रतिवर्ष मेला लगता है। प्रत्येक धर्मानुयायी दर्शनार्थ पहुँचते हैं। यह 12 वीं सदी के चर्चित व ख्यातिप्राप्त समाज सुधारक रहे। नदी के दूसरे छोर पर बाबा लतीफ़साह की समाधी स्थल है। जहाँ प्रत्येक गुरूवार को आपार भीड़ लगती है। नदी के पानी में लोग स्नान करते हैं। आचमन करते हैं। बाबा का जयकारा लगाते हुये झूमते-नाचते और गाते हैं। नदी के प्रति फैले भ्रांति को तोड़ने के लिये बहुत सारे लोग समय-समय पर कार्य करते रहे हैं। स्थानीय निवासी श्री रामजग सिंह जी बताते हैं कि पंडित कमलापति त्रिपाठी जी ने कर्मनाशा नदी का आर-पार भ्रमण किया। लोगों के मन में बैठे भ्रम को काफी हद तक दूर किया। उनके ही प्रयास से साहाबगंज नगर बसा साथ ही मंगरौर का पुल भी बना। जिससे आवागमन सुगम हुआ।

जिस नदी की अपनी अनूठी व विराट कहानी है वह अंततः यूपी, सोनभद्र, चंदौली, वाराणसी और गाजीपुर से होकर बक्सर में जाकर गंगा में विलीन हो जाती है। नदी का अस्तित्व बेशक गंगा में तिरोहित हो जाती है लेकिन उसकी कहानियाँ लोक में लोगों के बीच चर्चा-परिचर्चा का विषय बनकर रह जाती है। बचपन में सुनी हुई और युवावस्था में देखे हुये और पठन-पाठन के दौरान अनुसंधान ने नदी के उदगम, स्वरूप व किस्सों को नयी शक्लें दे देती हैं।

यह समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण का है। ऐसे में स्थानीय मिथ आधारित कहानियों का औचित्य खत्म सा हो जाता है। शिवप्रसाद सिंह ने 'कर्मनाशा की हार' कहानी के माध्यम से नदी को नये रंग-रोगन से सुसज्जित करने का भरसक प्रयास किया है। सदियों पुरानी सोच पर नये आवरण डालने का काम किया है। अगर लोक की बात पर गौर करें तो सोन और चन्द्रप्रभा जब हाथ में हाथ डालकर संग-साथ चलती हैं तब पटना में त्राहि-त्राहि मच जाती है। जब वहाँ पानी का स्रोत बढ़ता है तब नदियों में उफान आना स्वाभाविक है। नदी के तट पर बसे गाँव-घर का उजड़ जाना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात यह कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम मानव को वैकल्पिक व्यवस्था मुहैया नहीं करा पाये, उनके सोच को बदल नहीं पाये और ना ही नदी के संदर्भ में फैले भ्रम व भ्रांति का निवारण कर पाये तभी जो मिथ में दर्ज है। वैज्ञानिक विकास के दौर में भी लोगों के मानस में बैठा हुआ है।

21वीं सदी विज्ञान, तकनीक और संचार की सदी है। कर्मनाशा नदी को लेकर भ्रम को ख़त्म करने और मिथकों को तोड़ने के लिए विज्ञान और संचार का सहारा लेना लाज़िमी है। विज्ञान और संचार के सहारे कर्मनाशा के मिथकों को तोड़ने की ज़रूरत है।

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