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  • drsunita82

प्रेम काव्य 

हमारे पहाड़ों की स्त्री मधुमती प्रेम में डूबी महुए के ठसक में नहाई अरहर की खेत में अघाई सरसों के फूलों पर इतराई गेहूँ की बाली रोम-रोम में पिरोए पग-पग पर उदर वंचना को लपेटे

प्रेम में उन्मत्त सुमधुर सुनहले तवे पर लाला रोटी थाली में नून-प्याज के संग ठिठोली लरजते हाथों में यौवन की प्याली शरीर में जिम्मेदारियों की थिरकन बटोरे बाबले प्रेम में पागल आम-बबूल के साथ करती बातें लकड़ियों का गठ्ठर कपार पर लादे लपर-झपर दिन के सिकुड़ने से पहले जीवन की पालकी आँखों में बिछाए लौटे अबेर तक घर-द्वारे जहाँ प्यार में चूर चूल्हे-चौके चुपचाप बाट निहारें नहीं है उपहारों के सपने मगर बाजुओं में हुनर की अकूत कलाएं समोए... ...बाकी बाद में... डॉ.सुनीता

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